मातृदिवस पर निबंध
Kotatimes
Updated 6 years ago
एक शिशु का जब जन्म होता है, तो उसका पहला रिश्ता मां से होता है। एक मां शिशु को पूरे 9 माह अपनी कोख में रखने के बाद असहनीय पीड़ा सहते हुए उसे जन्म देती है और इस दुनिया में लाती है। इन नौ महीनों में शिशु और मां के बीच एक अदृश्य प्यार भरा गहरा रिश्ता बन जाता है। यह रिश्ता शिशु के जन्म के बाद साकार होता है और जीवन पर्यन्त बना रहता है।
मातृ दिवस मनाने का शुरुआत सर्वप्रथम ग्रीस देश में हुई थी, जहां देवताओं की मां को पूजने का चलन शुरु हुआ था। इसके बाद इसे त्योहार की तरह मनाया जाने लगा। हर मां अपने बच्चों के प्रति जीवन भर समर्पित होती है। मां के त्याग की गहराई को मापना भी संभव नहीं है और ना ही उनके एहसानों को चुका पाना। लेकिन उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता को प्रकट करना हमारा कर्तव्य है।
आश्चर्य की बात-
आज की उच्च पढ़ी लिखी युवा पीढ़ी अपने वृद्ध माता-पिता का सम्मान नही करती है। वृद्ध हो जाने पर संताने अपनी संतानों को तो बहुत प्यार दुलार करती है, पर वृद्ध माता-पिता अपेक्षित महसूस करते है।
कई लोग तो अपने वृद्ध माँ- बाप को अनाथ आश्रम में जाकर छोड़ देते है। वो ये भूल जाते है यदि माँ-बाप ने उनको इसी तरह अपेक्षित छोड़ दिया होता तो क्या होता। वो भूल जाते है की बचपन में किस तरह एक छींक आ जाने पर माँ चिंतित हो जाती थी, बुखार आ जाने पर दौड़कर बच्चे को अपनी गोद में लेकर डॉक्टर के पास भागती थी, खुद भूखे रहकर माँ हमारे लिए भोजन का इंतजाम करती थी। हमारी गलतियों को पिता से छुपाती थी, पिता की मार से बचाती थी। इस तरह के हजारो उदाहरण दिए जा सकते है जब माँ ने अपने बच्चो की ख़ुशीयों के लिए अपनी ख़ुशी का बलिदान दे दिया। पर आज की आधुनिक युवा पीढ़ी वृद्ध हो जाने पर माँ का ख्याल नही रखती है।
जैसे ही बेटे की शादी हो जाती है उसका ध्यान अपनी नव विवाहिता पत्नी की तरफ चला जाता है। अनेक बहुवें ससुराल में आते ही सास को ताने देना शुरू कर देती है। बेटा भी अपनी पत्नी का साथ देता है और माँ को अपेक्षित छोड़ देता है। पत्नी से उसका रिश्ता तो कुछ दिन पूर्व ही बना है जिसे बेटा अत्यधिक महत्व देता है।
पर आश्चर्य की बात है की माँ से बेटे का रिश्ता जन्म और खून का होता है जिसे वह कुछ दिनों में भुला देता है। इसलिए दोस्तों कहता हूँ की हम सभी को अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नही मोड़ना चाहिये।
“मातृ दिवस” मनाने का लक्ष्य है की अपने भाग दौड़ भरे व्यस्त जीवन से हम सभी अपनी माता को याद करने का समय निकाले। जिस तरह से आज सभी लोग बहुत व्यस्त है, शहरो में रह रहे बच्चे कई कई दिनों, हफ्तों तक अपनी माँ से बात नही कर पाते है। इसलिए यह दिवस मनाया जाता है जिससे हम अपनी माँ का हाल चाल से सकें।
“मातृ दिवस” के इस महान अवसर पर मैं एक कविता पढ़ना चाहूँगा –
घुटनों से रेंगते-रेंगते,
कब पैरों पर खड़ा हुआ,
तेरी ममता की छाँव में,
जाने कब बड़ा हुआ।।
काला टीका दूध मलाई
आज भी सब कुछ वैसा है,
मैं ही मैं हूँ हर जगह,
माँ प्यार ये तेरा कैसा है?
सीधा-साधा, भोला-भाला,
मैं ही सबसे अच्छा हूँ,
कितना भी हो जाऊ बड़ा,
“माँ!” मैं आज भी तेरा बच्चा हूँ।।
भगवान् का दूसरा रूप हैं माँ,
उनके लिए दे देंगे जां,
हमको मिलता हैं जीवन उनसे,
कदमों में हैं स्वर्ग बसा,
संस्कार वह हमें सिखलाती,
अच्छा बुरा हमें बतलाती,
हमारी गलतियों को सुधारती,
प्यार वह हम पर बरसाती,
तबियत अगर हो जाए ख़राब,
रात – रात भर जागते रहना,
माँ बिन जीवन हैं अधुरा,
खाली खाली सुना सुना,
खाना पहले हमें खिलाती,
बादमें वह खुद हैं खाती,
हमारी ख़ुशी में खुश हो जाती,
दुःख में हमारी आंसू बहाती,
कितने खुशनसीब हैं हम,
पास हमारे हैं माँ,
होते बदनसीब वे कितने,
जिनके पास न होती माँ।
आशा है आपको मेरा भाषण पसंद आया होगा। इन्ही शब्दों के साथ मैं अपना भाषण समाप्त करता हूँ।
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