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मातृदिवस पर निबंध

Kotatimes

Updated 6 years ago

 
Essay on Mother's day-
 
मातृ और दिवस दो शब्दों से मिलकर बना है जिसमें मातृ का अर्थ है मां और दिवस यानि दिन। इस तरह से मातृ दिवस का मतलब होता है मां का दिन। पूरी दुनिया में मई माह के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता है। मातृ दिवस मनाने का प्रमुख उद्देश्य मां के प्रति सम्मान और प्रेम को प्रदर्शित करना है। हर जगह मातृ दिवस मनाने का तरीका अलग-अलग होता है, लेकिन इसका उद्देश्य एक ही होता |
 
मां :
एक शिशु का जब जन्म होता है, तो उसका पहला रिश्ता मां से होता है। एक मां शिशु को पूरे 9 माह अपनी कोख में रखने के बाद असहनीय पीड़ा सहते हुए उसे जन्म देती है और इस दुनिया में लाती है। इन नौ महीनों में शिशु और मां के बीच एक अदृश्य प्यार भरा गहरा रिश्ता बन जाता है। यह रिश्ता शिशु के जन्म के बाद साकार होता है और जीवन पर्यन्त बना रहता है।
 
मां और बच्चे का रिश्ता इतना प्रगाढ़ और प्रेम से भरा होता है, कि बच्चे को जरा ही तकलीफ होने पर भी मां बेचैन हो उठती है। वहीं तकलीफ के समय बच्चा भी मां को ही याद करता है। मां का दुलार और प्यार भरी पुचकार ही बच्चे के लिए दवा का कार्य करती है। इसलिए ही ममता और स्नेह के इस रिश्ते को संसार का खूबसूरत रिश्ता कहा जाता है। दुनिया का कोई भी रिश्ता इतना मर्मस्पर्शी नहीं हो सकता।
 
मातृ दिवस :
मातृ दिवस मनाने का शुरुआत सर्वप्रथम ग्रीस देश में हुई थी, जहां देवताओं की मां को पूजने का चलन शुरु हुआ था। इसके बाद इसे त्योहार की तरह मनाया जाने लगा। हर मां अपने बच्चों के प्रति जीवन भर समर्पित होती है। मां के त्याग की गहराई को मापना भी संभव नहीं है और ना ही उनके एहसानों को चुका पाना। लेकिन उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता को प्रकट करना हमारा कर्तव्य है।
 
मां के प्रति इन्हीं भावों को व्यक्त करने के उद्देश्य से मातृ दिवस मनाया जाता है। यह दिन विशेष रूप से मां के लिए समर्पित है। इस दिन को दुनिया भर में लोग अपने तरीके से मनाते हैं। कहीं पर मां के लिए पार्टी का आयोजन होता है तो कहीं उन्हें उपहार और शुभकामनाएं दी जाती है। कहीं पर पूजा अर्चना तो कुछ लोग मां के प्रति अपनी भावनाएं लिखकर जताते हैं। इस दिन करे मनाने का तरीका कोई भी हो, लेकिन बच्चों में मां के प्रति प्रेम और इस दिन के प्रति उत्साह चरम पर होता है।
 
उपसंहार : धरती पर मौजूद प्रत्येक इंसान का अस्तित्व, मां के कारण ही है। मां के जन्म देने पर ही मनुष्य धरती पर आता है और मां के स्नेह दुलार और संस्कारों में मानवता का गुण सीखता है। हमारे हर विचार और भाव के पीछे मां द्वारा रोपित किए गए संस्कार के बीज हैं, जिनकी बदौलत हम एक अच्छे इंसान की श्रेणी में आते हैं। इसलि मातृ दिवस को मनाना और भी आवश्यक हो जाता है। हम अपने व्यस्त जीवन में यदि हर दिन न सही तो कम से कम साल में एक बार मां के प्रति पूर्ण समर्पित होकर इस दिन को उत्सव की तरह मना सकते हैं।
 

आश्चर्य की बात-

आज की उच्च पढ़ी लिखी युवा पीढ़ी अपने वृद्ध माता-पिता का सम्मान नही करती है। वृद्ध हो जाने पर संताने अपनी संतानों को तो बहुत प्यार दुलार करती है, पर वृद्ध माता-पिता अपेक्षित महसूस करते है।

कई लोग तो अपने वृद्ध माँ- बाप को अनाथ आश्रम में जाकर छोड़ देते है। वो ये भूल जाते है यदि माँ-बाप ने उनको इसी तरह अपेक्षित छोड़ दिया होता तो क्या होता। वो भूल जाते है की बचपन में किस तरह एक छींक आ जाने पर माँ चिंतित हो जाती थी, बुखार आ जाने पर दौड़कर बच्चे को अपनी गोद में लेकर डॉक्टर के पास भागती थी, खुद भूखे रहकर माँ हमारे लिए भोजन का इंतजाम करती थी। हमारी गलतियों को पिता से छुपाती थी, पिता की मार से बचाती थी। इस तरह के हजारो उदाहरण दिए जा सकते है जब माँ ने अपने बच्चो की ख़ुशीयों के लिए अपनी ख़ुशी का बलिदान दे दिया। पर आज की आधुनिक युवा पीढ़ी वृद्ध हो जाने पर माँ का ख्याल नही रखती है।

जैसे ही बेटे की शादी हो जाती है उसका ध्यान अपनी नव विवाहिता पत्नी की तरफ चला जाता है। अनेक बहुवें ससुराल में आते ही सास को ताने देना शुरू कर देती है। बेटा भी अपनी पत्नी का साथ देता है और माँ को अपेक्षित छोड़ देता है। पत्नी से उसका रिश्ता तो कुछ दिन पूर्व ही बना है जिसे बेटा अत्यधिक महत्व देता है।

पर आश्चर्य की बात है की माँ से बेटे का रिश्ता जन्म और खून का होता है जिसे वह कुछ दिनों में भुला देता है। इसलिए दोस्तों कहता हूँ की हम सभी को अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नही मोड़ना चाहिये।

“मातृ दिवस” मनाने का लक्ष्य है की अपने भाग दौड़ भरे व्यस्त जीवन से हम सभी अपनी माता को याद करने का समय निकाले। जिस तरह से आज सभी लोग बहुत व्यस्त है, शहरो में रह रहे बच्चे कई कई दिनों, हफ्तों तक अपनी माँ से बात नही कर पाते है। इसलिए यह दिवस मनाया जाता है जिससे हम अपनी माँ का हाल चाल से सकें।  

“मातृ दिवस” के इस महान अवसर पर मैं एक कविता पढ़ना चाहूँगा –

घुटनों से रेंगते-रेंगते,
कब पैरों पर खड़ा हुआ,
तेरी ममता की छाँव में,
जाने कब बड़ा हुआ।।
काला टीका दूध मलाई
आज भी सब कुछ वैसा है,
मैं ही मैं हूँ हर जगह,
माँ प्यार ये तेरा कैसा है?
सीधा-साधा, भोला-भाला,
मैं ही सबसे अच्छा हूँ,
कितना भी हो जाऊ बड़ा,
“माँ!” मैं आज भी तेरा बच्चा हूँ।।

 

भगवान् का दूसरा रूप हैं माँ,
उनके लिए दे देंगे जां,
हमको मिलता हैं जीवन उनसे,
कदमों में हैं स्वर्ग बसा,
संस्कार वह हमें सिखलाती,
अच्छा बुरा हमें बतलाती,
हमारी गलतियों को सुधारती,
प्यार वह हम पर बरसाती,
तबियत अगर हो जाए ख़राब,
रात – रात भर जागते रहना,
माँ बिन जीवन हैं अधुरा,
खाली खाली सुना सुना,
खाना पहले हमें खिलाती,
बादमें वह खुद हैं खाती,
हमारी ख़ुशी में खुश हो जाती,
दुःख में हमारी आंसू बहाती,
कितने खुशनसीब हैं हम,
पास हमारे हैं माँ,
होते बदनसीब वे कितने,
जिनके पास न होती माँ।

आशा है आपको मेरा भाषण पसंद आया होगा। इन्ही शब्दों के साथ मैं अपना भाषण समाप्त करता हूँ।

 
 
 

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